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रामधारी सिंह 'दिनकर'- जब नारी किसी नर से कहे, प्रिय! तुम्हें मैं प्यार करती हूँ

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Kavita  रामधारी सिंह 'दिनकर'- जब नारी किसी नर से कहे, प्रिय! तुम्हें मैं प्यार करती हूँ.  👩‍❤️‍💋‍👨 (1) प्रेम की आकुलता का भेद छिपा रहता भीतर मन में, काम तब भी अपना मधु वेद सदा अंकित करता तन में। (2) सुन रहे हो प्रिय? तुम्हें मैं प्यार करती हूँ। और जब नारी किसी नर से कहे, प्रिय! तुम्हें मैं प्यार करती हूँ, तो उचित है, नर इसे सुन ले ठहर कर, प्रेम करने को भले ही वह न ठहरे। (3) मंत्र तुमने कौन यह मारा कि मेरा हर कदम बेहोश है सुख से? नाचती है रक्त की धारा, वचन कोई निकलता ही नहीं मुख से। (4) पुरुष का प्रेम तब उद्दाम होता है, प्रिया जब अंक में होती। त्रिया का प्रेम स्थिर अविराम होता है, सदा बढता प्रतीक्षा में। (5) प्रेम नारी के हृदय में जन्म जब लेता, एक कोने में न रुक सारे हृदय को घेर लेता है। पुरुष में जितनी प्रबल होती विजय की लालसा, नारियों में प्रीति उससे भी अधिक उद्दाम होती है। प्रेम नारी के हृदय की ज्योति है, प्रेम उसकी जिन्दगी की साँस है; प्रेम में निष्फल त्रिया जीना नहीं फिर चाहती। (6) शब्द जब मिलते नहीं मन के, प्रेम तब इंगित दिखाता है, बोलने में लाज जब लगती, प्रेम तब लिखना...