मछुआ ,मांझी निषाद , गौड़ सखवार गोंड कश्यप वर्मन भोई राज समाज का इतिहास

मछुआ ,मांझी निषाद , समाज का इतिहास


जिसका कोई इतिहास नहीं उसका भी कोई भविष्य नहीं होता हैं

प्रत्येक व्यक्ति ,समाज जातिराष्ट्र का अपना इतिहास होता हें
बिना इतिहास के कोई भी समाज आगे नहीं बढ सकता.
इतिहास ही हमे बतायेगा कि हम आज भी क्यों पिछड़े हैं
जिसका कोई इतिहास नहीं उसका भी कोई भविष्य नहीं होता हैं. हमारा समाजकश्यपबिन्द ,मल्लाहकेवट ,मछुआ ,मांझी निषाद ,नाविकरैकवार ,गोड़ मेहरा इत्यादि सेकड़ो उपजातियो में बटा है . ऐसा क्या कारण है कि सैकड़ो उपजातियों में बटा समाज सैकड़ों संगठन और अनेक पार्टियों में भी बटा हुआ है .
इसका मुख्य कारण क्या है ?
 कश्यपबिन्द ,मल्लाहकेवट ,मछुआ ,मांझी निषाद ,नाविकरैकवार ,गोड़ मेहरा समाज के लोगों से बात करने पर मेरी समझ में यही आया है कि हमारा समाज  कश्यपबिन्द ,मल्लाहकेवट ,मछुआ ,मांझी निषाद ,नाविकरैकवार ,गोड़ मेहरा समाज के इतिहास से वंचित ही नहीं है बल्कि उसे इतिहास की गलत जानकारी है .

समाज के भिन्न -व्यक्तिओ ने न जाने कितने तरह का इतिहास बताया . जेसा जिसका इतिहास था उसका वेसा ही विचार था

कश्यपबिन्द ,मल्लाहकेवट ,मछुआ ,मांझी निषाद ,नाविकरैकवार ,गोड़ मेहरा समाज की एकता के लिए सबसे पहला कार्य ,समाज के इतिहास की एकता है .

जब तक इतिहास की एकता को लोगों तक नहीं पहुंचाया जायेगा तब तक कश्यप बिन्द, मल्लाह केवट आदि समाज की एकता का सपना भी नहीं देख पायेगे .

(हमारा सिद्धांत है एक इतिहास एक विचारधाराएक संगठन & एक उद्देश्य)

इसीलिए सभी कश्यपबिन्द ,मल्लाहकेवट ,मछुआ ,मांझी निषाद ,नाविकरैकवार ,गोड़ मेहरा समाज के बुद्धिजीवियों से अनुरोध है कि समाज के इतिहास को वैज्ञानिकता तथा एकता को स्थापित करें
विचार - विमर्स के लिए सभी साथियों से अनुरोध है अपना विचार अवस्य दे
भारत के राज्यों में अनेक उपजातियां (निषाद,बिंद, कश्यप,रैकवार,बाथम,मांझी,बर्मन,नाग,विनायक,आदि) है जिनकी जाति मुख्य जाति केवट है 
कश्यप, मल्लाह, केवट ,मछूआरा, माझी, तोमर,बिन्द,
रैकवार,नाविट = निषाद
पन्ना,ढमोह,जबलपुर (MP)में वर्मन भी लिखते है कुछ ढीमर और रीवा में सोंधिया ग्वालियर में बाथम और भी कई उपजातियाँ है लेकिन इतिहास में जितनी भी सरकारें आई या पार्टियां बनीं किसी भी पार्टी ने ऐसे समुदाय के लिये कुछ नही किया
केवट कश्यप कहार मांझी निषाद धीबर रैकवार मेहरा सहनी हम सब एक हैं
सैकडो उपनाम के साथ संपुर्ण भारत मे हम बिखरे हुये है माना की हमारे समाज के अधिकतर लोग गरिब है पर जो राजनिती से जुडे या गैरराजनिति संक्षम लोगो को आगे आनाना चाहियें !
अपने बुलंद हौसलों और खुद को जो कुछ आता था, उसी के दम पर मैं मेहनत करता रहा। संघर्ष के दिनों में मेरी माँ कहा करती थीं कि 12 साल में तो घूरे के भी दिन फिर जाते हैं. उनका यही मंत्र था कि अपनी धुन में लगे रहो. बस, मैंने भी यही मंत्र जीवन में बाँध रखा था कि अपना काम करते रहो, चीजें मिलें, न मिलें इसकी परवाह मत करो. हर रात के बाद दिन तो आता ही है.

“”
दशरथ माँझी का वक्तव्य
फिल्म: 'माँझी: द माउंटेन मैन में'[

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