India that is a भारत
#धम्म_लिपि_को_ब्राह्मी_लिपि_कहनेवाले_लोगोंका_एवं_ब्राह्मणी_षडयंत्र_का_पर्दाफाश..!
“जब डा बाबा साहब अम्बेडकर ने “भारतीय संविधान लिखा तब डा बाबा साहब अम्बेडकर ने भारतीय संविधान का पहला Article लिख दिया , और उसमें कहां कि , India that is a Bharat अर्थात् इंडिया ही भारत हैं , भारत ही इंडिया हैं| डा बाबा साहब अम्बेडकर ने भारतीय संविधान का पहला आर्टिकल यह बताने के लिए लिखा दिया कि , यह देश भारत देश हैं| बाबा साहब ने ऐसा क्यों लिख दिया ? क्योंकि डा बाबा साहब अम्बेडकर यह बात अच्छी तरह से जानतें थे कि , यह ब्राह्मण लोग उनके जाने के बाद भारत तथा India का ग़लत Translation करेंगे| इसलिए बाबा साहब को कहना पड़ा था कि , यह देश भारत देश हैं| बाबा साहब ने इस देश को भारत कहने के बावजूद भी कुछ ब्राह्मणवादी लोग जानबूझकर इस देश को “हिंदूस्थान” कहते हैं| जबकि सच्चाई यह हैं कि , आज की समय में भारत देश म अलग-अलग जाति संप्रदाय एवं धर्म के लोग रहते हैं|
डा बाबा साहब अम्बेडकर के समय में मुंबई को कुछ लोग गुजरात में शामिल करना चाहतें थे| तब डा बाबा साहब अम्बेडकर ने प्रबुद्ध भारत इस साप्ताहिक में ५ मई १९५६ को एक Article लिख दिया , और उसमें कहां कि , “मुंबई यह महाराष्ट्र की है”| इतना ही नहीं , बल्कि अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान मुंबई को Bombay कहां जाता था| डा बाबा साहब अम्बेडकर की वजह से Bombay से मुंबई हो गया| क्योंकि डा बाबा साहब अम्बेडकर अपने पुरखों का इतिहास अच्छी तरह से जानतें थे| आज जिस मुंबई को महाराष्ट्र की राजधानी कहां जाता हैं , वह मुंबई (मुंबापुरी) पहले बौद्धों की राजधानी हुआ करती थीं| तथागत बुद्ध की माता “कोली” थी , उनकी याद में कोलिय वंश के लोगों ने इस नगर का मुंबा पुरी यह नाम कर दिया था| दरअसल “मुंबादेवी” यह कोई और नहीं , बल्कि तथागत बुद्ध की माता महामाया ही हैं| जैसे बाबा साहब ने India ही भारत हैं , ऐसे कहां बिल्कुल वैसे ही उन्होंने Bombay ही मुंबई हैं ऐसा कहां हैं| किन्तु ब्राह्मण लोगों ने अत्यंत चालाकी से जैसे भारत का हिंदूस्थान किया / वैसे ही मुंबई का भी “बृहन्मुंबई” अर्थात् ब्राह्मणों की मुंबई यह नामकरण कर दिया हैं| उनकी यह धोखाधड़ी हमें ठीक तरह से समझनी होगी|
अब बात करते हैं , प्राचीन समय के धम्म लिपि की..! कुछ इतिहासकारों के मतानुसार धम्म लिपि यह सिंधु लिपि से विकसित हुई थीं/ हुई हैं| किन्तु सिंधु लिपि अब तक संपूर्ण तरीके से पढ़ी नहीं गई हैं| सिंधु लिपि के कुछ अक्षर धम्म लिपि से मिलते-जुलते हैं , सिर्फ़ वहीं अक्षर पढ़ें जा चुके हैं| “चक्रवर्ती सम्राट अशोक” ने अपने जितने भी “शिलालेख” बनवाएं थे| उन शिलालेखों में “इयं धंम लिपि” अर्थात यह “धम्म लिपि” हैं , ऐसा उन्होंने कहां हैं| चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने हजारों साल पहले ऐसा क्यों कहां होगा कि , यह धम्म लिपि हैं ? क्योंकि चक्रवर्ती सम्राट अशोक यह बात अच्छी तरह से जानतें थे कि , हों सकता हैं कि , आगे चलकर यह लिपि नष्ट होगी , कोई इसका ग़लत अर्थ निकालेगा / कोई इसे ग़लत तरीके से भाषांतरण करेगा| इसलिए उन्होंने पहले ही कह दिया था कि , अभिलेखों में जो लिपि लिखीं हैं| वह धम्म लिपि हैं|
चक्रवर्ती सम्राट अशोक के बाद सिर्फ़ लिपि ही नहीं , बल्कि “धम्म” को भी नष्ट करने में कुछ ब्राह्मणवादी लोग कामयाब हुए थे| धम्म प्रचारकों को नष्ट करने के लिए “पुष्यमित्र शुंग” जैसे शासकों ने आदेश दिया था कि , जो भी बौद्ध भिक्खूओं के कटे हुए सर उन्हें लाकर देगा , उन्हें १०० सुवर्ण मुद्राएं बक्षीस स्वरूप भेंट दी जाएगी| अपनी जान बचाने के लिए बौद्ध भिक्खू विदेश गए| और वहां पर उन्होंने धम्म का प्रचार और प्रसार किया| प्रतिक्रान्ति के बाद तथागत बुद्ध की मूर्तियों को कृष्ण , विष्णु , शिव की मूर्ति कहने की प्रथा पड़ी थीं| बौद्ध विहारों को मंदिरों में बदल दिया था| बुद्ध मूर्तियों को तोड़-मरोड़कर कर काल्पनिक देवी-देवताओं का नाम दिया था| किन्तु जब भारत में अंग्रेजों का शासन आया , वहीं से बौद्ध धम्म का सही और सच्चा इतिहास सामने आने लगा|
संपूर्ण भारत में जितने भी बौद्ध स्तूप , बौद्ध शिलालेख , बौद्ध विहार , बौद्ध संघाराम , बौद्ध गुफाएं एवं बौद्ध वास्तू तथा धरोहर हैं , वह सभी अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान खोजें गए हैं| चक्रवर्ती सम्राट अशोक के अभिलेखों में जो लिखा था , वह सबसे पहले पढ़ने वाले तथा तथागत बुद्ध एवं चक्रवर्ती सम्राट अशोक का इतिहास दुनिया के सामने लाने वाले वह प्रसिद्ध व्यक्ति आदरणीय जेम्स प्रिंसेप थे| जेम्स प्रिंसेप इन्होंने चक्रवर्ती सम्राट अशोक के शिलालेख पढ़ें| और दुनिया को बताया कि यह “धम्मलिपि” हैं| जब चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने कहां हैं कि , यह धम्म लिपि हैं , ब्रिटिश संशोधक जेम्स प्रिंसेप ने भी इतने स्पष्ट शब्दों में कहां कि , यह धम्म लिपि हैं| फ़िर कौन हैं ? वह लोग ? जो इस धम्म लिपि को “ब्रह्म लिपि” अथवा “ब्राह्मी लिपि” कहते हैं ? चक्रवर्ती सम्राट अशोक के किसी भी शिलालेख में यह “ब्राह्मी लिपि” हैं| इसका ज़िक्र नहीं मिलता| क्या यह लिपि ब्रह्मा ने लिखीं हैं ? जितने भी शिलालेख एवं अभिलेख मिलें हैं , क्या वह ब्रह्मा ने बनाएं हैं ? तथागत बुद्ध की वाणी से निकलें हुएं हर एक शब्दों को चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने दुनिया के सामने लाने का काम किया , हजारों सालों के बाद भी हम यह लिपि देख सकतें हैं/ समझ सकतें हैं| यह चक्रवर्ती सम्राट अशोक की ही देन हैं| कोई ब्रह्मा इस लिपि का लेखक न होकर ख़ुद चक्रवर्ती सम्राट अशोक ही इस लिपि के असली लेखक हैं|
भारत ही नहीं , बल्कि संपूर्ण विश्व ने चक्रवर्ती सम्राट अशोक का शुक्रगुजार होना चाहिए| क्योंकि उन्होंने इस लिपि को धम्म लिपि कहां हैं| धम्म लिपि यह हमें सीधा तथागत बुद्ध के पास लेकर जाती हैं| धम्म लिपि आईं ? तों तथागत बुद्ध के उपदेश भी आएं| तथागत बुद्ध के उपदेश आएं ? तों उनका जीवनचरित्र भी आया| इसी तरह धम्म लिपि यह हमें सीधा तथागत बुद्ध और धम्म से जोड़ती हैं| किन्तु कुछ ब्राह्मणवादी लोग इसे ब्राह्मी लिपि अर्थात ब्रह्मा की लिपी से जोड़ते हैं , अर्थात यह ब्रह्मा ने लिखी हुई लिपि ऐसा वह कहते हैं , जो कि सरासर ग़लत हैं| धम्म लिपि को ब्राह्मी लिपि कहना यह एक ब्राह्मणी षढयंत्र हैं , इस बात को हमें गंभीरतापूर्वक समझना होगा , और धम्म लिपि को धम्म लिपि ही कहना होगा| चक्रवर्ती सम्राट अशोक के कालखंड में अखंड जम्बूद्वीप यह पहले बौद्ध राष्ट्र हुआ करता था| मुंबई भी बौद्ध नगरी थीं , किन्तु जिस तरह से भारत को हिंदूस्थान अर्थात हिंदूओं का स्थान कर दिया , उसी तरह से मुंबई नगरी को भी बृहन्मुंबई अर्थात् ब्राह्मणों की मुंबई कर दिया| इतिहास बदलना इन लोगों के लिए कोई बड़ी बात नहीं है , क्योंकि पढ़ने-लिखने का अधिकार सिर्फ़ इन्हीं लोगों के पास था| किन्तु हमारे पुरखे महान् थे , उन्होंने इस व्यवस्था से लड़-झगड़कर हमें फिर से शिक्षा का अधिकार दिया| इसलिए हम धन्यवाद ज्ञापन करतें हैं , चक्रवर्ती सम्राट अशोक का जिन्होंने धम्म लिपि को धम्म लिपि ही कहां| हम शुक्रगुजार हैं , उस महान व्यक्ति के जिन्होंने इस “धम्म लिपि” को पढ़ा , और उसका अर्थ हमें समझाया| आज हम उस महान ब्रिटिश संशोधक सर “जेम्स प्रिसेंप” जी के जयंती अवसर हम उन्हें कोटी कोटी नमन करतें हैं| तथा हम यह वादा करते हैं कि , हम इस धम्म लिपि को ब्राह्मि लिपि न कहकर हम इसे धम्म लिपि ही कहेंगे”.
— शालिनी अम्बेडकर _
बुद्धिस्ट इंटरनेशनल नेटवर्क..
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